Environmental Studies: क्या है पर्यावरण शिक्षा का स्कोप, जानें इस डिग्री के बाद कैसे बदलेगा आपका करियर

Career In Environmental Science: जिस तरह से हमारे भू-मंडल के वायुमंडल और पर्यावरण में लगातार बदलाव हो रहा है और नित्‍य-प्रतिदिन तापमान और मौसम में बदलाव हो रहा है, उससे मानव जीवन खतरे में पड़ती जा रही है। इसलिए अब पर्यावरण शिक्षा सभी के लिए जरूरी हो गया है। यह शिक्षा उस विशिष्ट शिक्षा को कहते है जो जन-समुदाय को पर्यावरण जानकारियों से परिचित कराकर पर्यावरण बोध को पुष्ट करती है, पर्यावरण कठिनाइयों के कारण निवारण का मार्ग ढूंढती है तथा भविष्य की कठिनाइयों से आगाह कर जीवन को निरापद बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है।

वहीं पर्यावरण शिक्षा को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि पर्यावरण शिक्षा वस्तुत: विश्व समुदाय को पर्यावरण सम्बन्धी दी जाने वाली वह शिक्षा है जिससे समस्याओं से अवगत होकर उनका समाधान ढूंढने और भविष्य में उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों की रोकथाम के लिये आवश्यक जानकारी प्राप्त होती है, जिसके आधार पर व्यक्तिगत या सामूहिक स्तर पर पर्यावरण समस्याओं से निजात पाने का मार्ग ढूंढा जा सकता है और भविष्य की कठिनाइयों को जाना जा सकता है।

पर्यावरण शिक्षा के प्रकार (Types Of Environmental Education)

औपचारिक पर्यावरण शिक्षा
पर्यावरण शिक्षा दो प्रकार की होती है, पहली औपचारिक पर्यावरण शिक्षा और प्रशिक्षण, यह वह शिक्षा है जिसके पात्र छात्र-छात्राएं, कार्यरत कर्मचारी, प्रशासनिक अधिकारी और पर्यावरण के प्रति अभिरूचि रखने वाले पढ़े-लिखे लोग होते हैं।

अनौपचारिक पर्यावरण शिक्षा
अनौपचरिक पर्यावरणीय शिक्षा मुख्यत: अनपढ़ लोगों को प्रदान की जाती है। ऐसे लोगों की अतिरिक्त कम पढ़े-लिखे और काम-धन्धों में लगे लोगों को भी ऐसी शिक्षा की आवश्यकता होती है। ऐसे वर्ग के लोगों के लिये विशेष व्यवस्था की आवश्यकता होती है, क्योंकि अनपढ़ होने के कारण इन्हें ऐसे तरीकों से शिक्षित किया जाता है, ताकि वे पर्यावरण के विविध पक्षों को समझ सकें।
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पर्यावरण शिक्षा का महत्‍व (Importance Of Environmental Education)
इस समय सबसे ज्वलंत प्रश्न यह है कि पर्यावरण शिक्षा का महत्‍व क्‍या है और क्या पूर्ववर्ती शिक्षा में पर्यावरण सम्मिलित नहीं था। वास्तव में पर्यावरण शिक्षा का दौर विगत 25 वर्षों में ही प्रारंभ हुआ है और अब सबसे महत्त्वपूर्ण हो गया है। पर्यावरण शिक्षा का मूल उद्देश्य मानव-पर्यावरण के अंतर्सबंधों की व्याख्या करना तथा उन संपूर्ण घटकों का विवेचन करना है जो पृथ्वी पर जीवन को परिचालित करते हैं इसमें मात्र मानव जीवन ही नहीं अपितु जीव-जंतु एवं वनस्पति भी सम्मिलित हैं। मानव, तकनीकी विकास एवं पर्यावरण के अंतर्संबंधों से जो पारिस्थितिकी चक्र बनता है और वह संपूर्ण क्रिया-कलापों और विकास को नियंत्रित करता है। यदि इनमें संतुलन रहता है तो सब कुछ सामान्य गति से चलता रहता है, लेकिन अगर इनमें व्यतिक्रम आता है तो पर्यावरण का स्वरूप विकृत होने लगता है और उसका हानिकारक प्रभाव न केवल जीव जगत अपितु पर्यावरण के घटकों पर भी होता है। इससे पूरी मानव सभ्‍यता खतरे में पड़ जाएगी।

पर्यावरण शिक्षा क्‍या है (What Is Environmental Education)
पर्यावरण शिक्षा ऐसा विषय है जिसमें छात्रों को बताया जाता है कि प्राकृतिक पर्यावरण के तरीके और प्रदूषण मुक्त पर्यावरण को बनाए रखने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र को कैसे व्यवस्थित रखना चाहिए। यह शिक्षा संबंधित चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्यावरण शिक्षा आवश्यक कौशल और विशेष ज्ञान को प्रदान करता है। इस शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान प्रदान कराना, जागरूकता पैदा करना, चिंतन का एक दृष्टिकोण पैदा करना और पर्यावरणीय चुनौतियों को नियंत्रित करने के आवश्यक कौशल को प्रदान करना है।
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आज क्यों आवश्यक है पर्यावरण शिक्षा की (Why Environmental Education Is Necessary Today)

  1. पर्यावरणीय शिक्षा को पर्यावरण की स्थिति का आंकलन करने में सक्षम होना चाहिए और पर्यावरण की क्षति का निवारण करने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। दैनिक जीवन में सामान्य बदलाव पर्यावरण को सुधारने में ये बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं।
  2. पर्यावरण की सुरक्षा हर किसी की जिम्मेदारी है। इसलिए पर्यावरण शिक्षा एक समूह या समाज तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि हर व्यक्ति को पर्यावरण के बचाव संबंधी जानकारी होनी चाहिए।
  3. अगर बच्चों को संसाधनों, पर्यावरणीय प्रदूषण, मृदा अपरदन, अवनति और संकटग्रस्त पौधों एवं विलुप्त जानवरों के बचाव तथा संरक्षण के बारे में सिखाया जाता है तो पर्यावरण के संरक्षण में काफी हद तक सुधार हो सकता है।
  4. भारत के विश्वविद्यालयों में शिक्षण, अनुसंधान और प्रशिक्षण पर काफी ध्यान दिया गया है। 20 से अधिक विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थानों में पर्यावरण इंजीनियरिंग, संरक्षण और प्रबंधन, पर्यावरण स्वास्थ्य और सामाजिक विज्ञान जैसे पाठ्यक्रमों को पढ़ाया जाता है।
  5. भारत सरकार ने पर्यावरण और वन मंत्रालय के समर्थन से अगस्त 1984 में पर्यावरण शिक्षा केंद्र स्थापित किया था। इसके प्रमुख कार्यों में से एक यह है कि पर्यावरण शिक्षा की भूमिका को उचित मान्यता देने का प्रयास किये जाये। यह इससे संबंधित कई शैक्षिक कार्यक्रमों को चलाती है।
  6. बच्‍चों के पास आज प्राकृतिक दुनिया के बारे में जानने के लिए बिल्कुल भी समय नहीं है। इससे न केवल बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है बल्कि उन्हें अपने परिवेश और प्रकृति से विलगाव जैसी स्थित का सामना करना पड़ता है। प्राकृतिक संसाधनों की कमी के कारण पर्यावरण की दृष्टि से शिक्षित पीढ़ी के लिए इस शिक्षण की जरूरी आवश्यकताओं में से एक है।
  7. इसलिए पर्यावरण शिक्षा को एक पाठ्यक्रम के रूप में संयोजित करना और छात्रों को बचपन से ही प्रकृति के बारे में अवगत कराना एक सही विकल्प है।

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